" जब तुम न थी "

था अधुरा सा जब तुम न थी.....
हाँ हर पल सोचता था, तुम्हारे जैसा....
जब तुम न थी....!!

एक कमी सी थी , एक जरुरत सी थी....
ज़िन्दगी के उन पलो मैं, जब तुम न थी..!!

सोचता था तुम्हारे जैसे इंसान को....
सोचता था शायद की, कुछ ज्यादा ही सोच रहा हूँ...
जब तुम न थी....!!

क्या कोई मुझे समझ सकेगा....
ऐसा न हो जाये के मुझसे मुझे खोने के बाद मुझे कोई अपनाये....
इसी डर से सहम जाता था ....जब तुम न थी...!!

हाँ था अकेला इस ज़िन्दगी मैं....
तनहा सा...बेबस सा....हाँ कुछ कमी सी तो थी...जब तुम न थी...!!

रिश्ते को खोने का डर...
या किसी को सोचके खुद को पाने की ख़ुशी...
इन्ही सब बातों से अनजान था...जब तुम न थी...!!

अब जबकि मुझे मेरा साथी मिल गया हैं....
वैसा ही जैसा मैंने सोचा था...
थी कल की बात...
जिन बातों को सोच कर घबरा दिया करता था....
आज इस एहसास के साथ खुश हूँ...
के हुई हैं मेरी हर ख़ुशी पूरी तुम्हारे साथ....
और सोचना मैंने कर दिया हैं बंद ...
और जीने लगा हूँ...
बस ख़तम हो गया हैं वो सफ़र...
जब मैं कुछ सोचा करता था.....
जब तुम न थी......
जब तुम न थी....
जब तुम न थी.....

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