Haan kuch to ajeeb sa chal raha...


हूँ खाली सा या खुद अकेला हूँ...
दिल से फिर परेशान सा लग रहा...
हाँ कुछ तो अजीब सा चल रहा...!

एक अजीब सी चाह सी हैं..
एक अजीब सी मांग हैं शायद....
तभी पूरी होने में टाइम लग रहा...
हाँ कुछ तो अजीब सा चल रहा...!

चाहता हूँ बहुत कुछ खुद से ...
होता हैं धीरे धीरे ...
इस गति से डर सा लग रहा...
हाँ कुछ तो अजीब सा चल रहा...!

एक साल हो गया अपने साथी के साथ...
खुश हूँ और सब खुश से भी लग रहे...
बस अंदर एक डर पनप रहा...
हाँ कुछ तो अजीब सा चल रहा...!

चाहता हूँ सबकी ख़ुशी ...
दिल से करता भी हूँ...
मायूस हो जाता हूँ समय की मार से...
क्यों ऐसा हो रहा...
अब तो सच में कुछ तो अजीब सा चल रहा..!

शायद हैं मेरी परीक्षा ..
जिसके लिए मुझे चुना गया होगा...
टूट न जाऊ ये डर लगा रहता हैं...
फिर ये दिल कहता हैं....
मत डर तू और न घबरा इस समय से...
खुद से और इस दुनिया से जा भीड़ ...
पर फिर एक एहसास सा आता हैं और मन बेचैन हो उठता हैं...
कुछ तो हैं जो चल रहा....
हाँ सच हैं कुछ तो अजीब सा चल रहा....!!


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